लॉर्ड मैकाले स्मृति दिवस
चौ.लौटनराम निषाद
राजनीतिज्ञ,कवि, इतिहासकार,साहित्यकार, निबन्धकार,समीक्षक, शिक्षाविद, न्यायविद अर्थात बहुप्रतिभा के धनी व्यक्तित्व के रुप में विख्यात हैं लोर्ड मैकाले।
लॉर्ड टॉमस बैबिंग्टन मैकॉले 1834 से 1838 तक मैकॉले भारत की सुप्रीम काउंसिल में लॉ मेंबर तथा लॉ कमिशन का प्रधान रहे। प्रसिद्ध दंडविधान ग्रंथ "दी इंडियन पैनल कोड" की पांडुलिपि मैकॉले ने तैयार की थी। अंग्रेजी को भारत की सरकारी भाषा तथा शिक्षा का माध्यम और यूरोपीय साहित्य, दर्शन तथा विज्ञान को भारतीय शिक्षा का लक्ष्य बनाने में मैकॉले का बड़ा हाथ था।
जन्म 25.10.1800 रोथले टैंपिल (लैस्टरशिर) में हुआ। पिताजी जकारी मैकॉले व्यापारी थे। शिक्षा केंब्रिज के पास एक निजी विद्यालय में, फिर एक सुयोग्य पादरी के घर, तदनंतर ट्रिनिटी कालेज कैंब्रिज में हुई। 1826 में वकालत शुरू की। इसी समय अपने विद्वत्ता और विचारपूर्ण लेखों द्वारा लंदन के शिष्ट तथा विज्ञ मंडल में पैठ पा गया।
1830 में लॉर्ड लेंसडाउन के सौजन्य से पार्लियामेंट में स्थान मिला। 1832 के रिफॉर्म बिल के अवसर पर की हुई इसकी प्रभावशाली वक्ताओं ने तत्कालीन राजनीतिज्ञों की अग्रिम पंक्ति कें इन्हें स्थान दिया। 1833 से 1856 तक कुछ समय छोड़कर, इन्होंने लीड्स तथा एडिनगबर्ग का पार्लिमेंट में क्रमश: प्रतिनिधित्व किया। 1857 में इन्हें हाउस ऑव लॉर्ड्स का सदस्य बनाया गया। पार्लिमेंट में कुछ समय तक इन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी संबंधी बोर्ड ऑव कंट्रोल के सचिव, तब पेमास्टर जनरल और तदनंतर सैक्रेटरी ऑव दी फोर्सेज के पद पर काम किया।
साहित्य के क्षेत्र में भी मैकॉले ने महत्वपूर्ण काम किया। इन्होंने अनेक ऐतिहासिक और राजनीतिक निबंध तथा कविताएँ लिखी हैं। इनके क्लाइव, हेस्टिंग्स, मिरावो, मैकिआवली के लेख तथा "लेज ऑव एंशेंट रोम" तथा "आरमैडा" की कविताएँ अब तक बड़े चाव से पढ़ी जाती हैं। इनकी प्रमुख कृति "हिस्ट्री ऑव इंग्लैंड" है, जो इन्होंने बड़े परिश्रम और खोज के साथ लिखी थी और जो अधूरी होते हुए भी एक अनुपम ग्रंथ है।
मैकॉले बड़े विद्वान्,मेधावी और वाक्चतुर थे। इनके विचार उदार, बुद्धि प्रखर, स्मरणशक्ति विलक्षण और चरित्र उज्जवल था।
स्त्री व बहुजन शिक्षा के क्रांतिदू
नई शिक्षा नीति लागू कर बहुजनों की उन्नति एवं मुक्ति का द्वार खोलने वाले लॉर्ड मैकाले भले ही किसी और काम के लिए आलोचना के पात्र हों, किंतु बहुजनों के लिए मसीहा से कम नहीं हैं।
1813 में ब्रिटिश संसद ने प्रस्ताव पारित किया कि भारत में सभी की शिक्षा पर कम से कम एक लाख प्रति वर्ष खर्च किया जाए। परंतु भाषा विवाद हो गया। लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी पर जोर दिया। लाॅर्ड मैकाले शिक्षा नीति के तहत (1835-1853) प्रत्येक जिले में जिला स्कूल खोले गए। 1844 में अंग्रेजी पढ़े लोगों को सर्विस में प्राथमिकता की घोषणा की गई। “भारतीय शिक्षा का इतिहास” के लेखक “शंकर विजयवर्गीय” के अनुसार अंग्रेजी शिक्षा ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को जन्म दिया। राजनीतिक, वैज्ञानिक, धार्मिक विचारधारा पनपी।
पढ़ना पढ़ाना अर्थात शिक्षक और शिक्षार्थी बनाना बहुजनों के लिए निषिद्ध था। लॉर्ड मैकाले ने शिक्षक भर्ती की नई व्यवस्था की, जिसमें हर जाति धर्म का व्यक्ति शिक्षक बनने का अधिकारी था अर्थात और लार्ड मैकाले की शिक्षा नीति ने शिक्षक और शिक्षार्थी बनने के लिये सभी के रास्ते खोल दिये।
यह भी देखें…
परंपरावादी लोग ब्राह्मणों का शिक्षा पर एकाधिकार को चुनौती देने के कारण मैकाले की आलोचना करते हैं जबकि मैकाले ने शिक्षा में समता की धारा को प्रवाहित किया। इसी कारण मैकाले के कथन,”हमारे पास उपलब्ध संसाधनों के आधार पर यह मुमकिन नहीं कि सभी भारतीयों को एक साथ शिक्षित किया जा सके। कोशिश करनी चाहिए कि ऐसा वर्ग तैयार किया जाए जो रक्त-रंग से तो भारतीय हो पर संवाद नजरिया नैतिकता बौद्धिकता में इंग्लिश हो जो हमारे शेष भारतीयों के बीच इंटरप्रेटर का काम कर सके” को गलत समझा गया जबकि मैकाले भारत का भाग्य विधाता साबित हुआ। अंग्रेजी ज्ञान के कारण भारत आगे बढ़ा और बढ़ रहा है और जिसकी बदौलत डॉ आंबेडकर जैसा विश्वरत्न दुनिया को मिला। अंग्रेजी में लिखी “सर एडविन अर्नाल्ड” की “लाइट ऑफ एशिया” से बुद्धा को विश्व फलक पर जगह मिली।
प्रसिद्ध स्तंभकार, लेखक और चिंतक चंद्रभान प्रसाद का मानना है कि अंग्रेज भारत में देर से आया और पहले चले गए। यदि ब्रिटिश शासन 1600 में पूर्णत: स्थापित हो जाता और 2001 तक रहता तो पिछड़ा समाज उन्नति के उच्च सोपान पर होता।
स्त्री व बहुजनों के न्यायदूत
लॉर्ड मैकाले ने भारत आने से पूर्व ब्रिटिश पार्लियामेंट को संबोधित करते हुए कहा था- भारत में असमान ब्राह्मण कानून चलता है जो भारत के लिए घातक है।10.6.1834 को लोर्ड मैकाले गवर्नर जनरल की काउंसलिंग का कानून सदस्य नियुक्त होकर भारत आया। उन्होंने यहां की व्यवस्था में सामाजिक भेदभाव धार्मिक पाखंडवाद और शैक्षिक गैर बराबरी का तांडव देखा। मैकाले ने देखा कि यहां के दंड व्यवस्था जाति और वर्ण के आधार पर बंटी हुई है। जहां इंसानियत का इतना निरादर किया गया है कि एक शुद्र आदमी की स्थिति एक जानवर से भी अधिक गिरी हुई है और दूसरे ब्राह्मण आदमी को देवतुल्य स्थान प्राप्त है।
1834 में ही पहला भारतीय विधि आयोग का गठन हुआ जिसका प्रथम प्रेसिडेंट लॉर्ड मैकाले था। लार्ड मेकाले ने 14 अक्टूबर 1837 को IPC का ड्राफ्ट रिपोर्ट तत्कालीन गवर्नर जनरल को सौंप दिया। कई बार जांच पड़ताल के बाद ड्राफ्ट रिपोर्ट को अंतिम रुप से 1856 में प्रस्तुत किया गया और 6 अक्टूबर 1860 को इंडियन पेनल कोड (भारतीय दंड संहिता) के रूप में यह भारत में लागू हो गया। इसके पारित होते ही भारत के सभी विषमता पर आधारित मनु के पूर्ववर्ती नियम कानून निष्प्रभावी हो गए तथा देश में कानूनी एकरूपता और समानता आ गई। मनु का विषमतावादी कानून मिट गया। वर्ण व जातिवाद की रीढ़ टूट गई। यह भारत में बहुजनों के हक में सबसे बड़ी क्रांतिकारी घटना थी।
6.10.1860 के दिन आईपीसी के लागू होने से यह दिन बहुजनों के लिए बहुत महत्व रखता है। पहले भारत में मनुस्मृति आधारित कानून एवं दंड विधान थे। निम्न वर्ण पर मनु की अग्रलिखित निषेधाज्ञाएं थी – शुद्र विद्या, संपत्ति, शस्त्र से रहित रहे, गांव के आखिरी छोर पर बसे, जूठन खाए, मुर्दों के वस्त्र पहने, राजा व न्यायधीश ना बने, कच्चे घरों में रहे, बिना पगार सेवा करे, आर्थिक दंड राजकोष में जमा, पीड़ित को मुआवजा नहीं। मनुविधान के कारण डॉ.अंबेडकर, छत्रपति शिवाजी, शाहू जी महाराज ज्योतिबा फुले तिरस्कृत हुए। एक ही अपराध पर ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शुद्र को अलग अलग दंड का प्रावधान था। ब्राह्मण स्त्री से, शुद्र व्यभिचार करें तो गुप्तांग काटकर संपत्ति हड़पने का दंड, वैश्य करे तो एक वर्ष की कैद व संपत्ति हड़पने का दंड, क्षत्रिय या ब्राह्मण करें तो एक हजार पण का आर्थिक दंड मात्र।
ब्राह्मण चारों वर्णों की स्त्री भोग सकता था। ब्राह्मण मृत्युदंड से मुक्त था चाहे कितना भी जघन्य अपराध किया हो। लॉर्ड मैकाले ने मनुस्मृति की भेदभाव पर आधारित न्याय व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया जिसके तहत प्रथम बार नंद कुमार देव ब्राह्मण अपराधी को 1774 में फांसी की सजा सुनाई गई। जाति वर्ण आधारित दंड व्यवस्था का यह मनुस्मृति कानून भारत में 6.10.1860 तक चला।
अपने वर्चस्व वाली जीवन व्यवस्था को खोने से ब्राह्मणों के प्राण निकल रहे थे। उन्होंने प्राणपण से लॉर्ड मैकाले का विरोध किया। मैकाले का कानून लागू होने पर भी ब्राह्मण मानने को तैयार नहीं था। समाज में आज तक भी मनुविधान का भूत उतरा नहीं है। गाहे-बगाहे इसके समर्थक आज भी मिलते हैं। 9.1.1917 को यवतमाल में बाल गंगाधर तिलक ने ऐलान किया था कि हमारा कानून मनुस्मृति है। राजस्थान में हाईकोर्ट के सामने मनु का स्टेच्यु, 2015 में याकूब मेनन की फांसी के आदेश के समय मनुस्मृति का श्लोक पढ़ा जाना है इसके उदाहरण भर हैं।
परंपरावादी लोग मनु विधान को चुनौती देने के कारण मैकाले की नीति की आलोचना करते हैं।
आरोप लगाते हैं कि लॉर्ड मैकाले ने ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक उद्देश्यों की पूर्ति करने, जड़े जमाने, अंग्रेजी साहित्य का प्रचार करने तथा इंग्लैंड की चीजों के उपभोग को बढ़ाने के लिए ही अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा दिया।
जब भी देश में शिक्षा के निरंतर गिरते स्तर पर चर्चा होती है तो इसके लिए सबसे पहले ब्रिटिश विद्वान लॉर्ड मैकाले को गाली देकर शुरुआत की जाती है। खासतौर से बुद्धिजीवी तबका तो अपनी नाकामी को छुपाने के लिए ब्रिटिश, अंग्रेजी और मैकाले पर ही सारी शैक्षणिक बर्बादी का ठीकरा फोड़ देते हैं। इससे बहुजन भी इतिहास की असलियत को जाने बिना मैकाले को दुश्मन मान रहा है।
बारीकी से देखें तो ये सारे आरोप निराधार हैं। यदि अंग्रेजों द्वारा मिशनरी स्कूलों में वंचितों को प्रवेश नहीं मिलता तो ज्योतिबा फूले, डॉ.अंबेडकर पैदा ही नहीं होते क्योंकि वे शूद्र/अछूत वर्ग से थे। बाबा साहेब की अंग्रेजी व ज्ञान का भारत के ही नहीं बल्कि विदेशी लोग भी लोहा मानते थे। स्वामी विवेकानंद को अंग्रेजी ज्ञान (सिस्टर्स एंड ब्रदर्स संबोधन) के कारण अमेरिका में बहुत ख्याति मिली।
मौर्य शासनकाल में भारत शिक्षा साहित्य कला विज्ञान समाज की दृष्टि से सोने की चिड़िया था। मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्या के बाद एक बार फिर वर्ण/जाति व्यवस्था का वर्चस्व हो गया। जिसको मैकाले व आधुनिक विज्ञान ने तोड़ा। मैकाले ने अंग्रेजी के फायदे के बारे में विस्तृत रुप से बताया है। उनका मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य इंसानों में गैर बराबरी को तोड़कर बराबरी स्थापित करना है। अंधविश्वास और गलत परंपराओं से मुक्ति दिलाना है। शिक्षा का अर्थ से पुरानी बातों को रटना, बार-बार दोहराना, स्वयं ही गुणगान करना दुनिया से कटे रहना नहीं है। बल्कि दुनिया को एक बेहतर जगह बनाना है।
वंचित समाज में लॉर्ड मैकाले व डॉ.अंबेडकर के कारण शिक्षा की जो किरण आई थी वह अब प्रतिनिधित्व (तथाकथित आरक्षण) के खात्मे, शिक्षा के निजीकरण व महंगीकरण, शिक्षा व सरकारी स्कूलों की उपेक्षा, शैक्षणिक संस्थानों पर पूंजीपतियों का कब्जा से वह धीरे धीरे बुझती जा रही है। गांव में बहुजन समाज के बच्चे आठवीं दसवीं से आगे बढ़ नहीं पा रहे हैं। क्लर्क डॉक्टर इंजीनियर बनना तो बहुत दूर की बात है। इल्जाम लगाते हैं कि मैकाले ने सिर्फ बाबू तैयार किए लेकिन अब तो उच्च वर्णों के खेतों फैक्ट्रियों महलों सड़कों पर काम करने के लिए गुलामों की पौध तैयार हो रही है जो बहुजन समाज की है।
शोषक वर्ग की साजिश साकार होती नजर आ रही है कि शोषित को शिक्षा से दूर रखकर, हर हालात में तीर्थयात्रा, पूजापाठ, कर्मकांड, तीजत्योहारों में व्यस्त रखो। उसकी सारी कमाई येन-केन-प्रकारेण शोषक वर्ग की तिजोरी में ही जाए। आज बहुजन निरर्थक तीर्थयात्रा, पूजापाठ, कर्मकांड, तीजत्योहार, परंपराओं में मदहोश है। उसे अपनी भावी पीढ़ी की जरा भी चिंता नहीं है। आखिर यह वर्ग अपने सामाजिक शैक्षणिक विकास के प्रति कब सचेत होगा। बुद्ध-कबीर-फुले-अंबेडकर की शिक्षा को कब अपने जीवन में उतारेगा।
अमेरिका में जो काम अब्राहम लिंकन व रूस सहित साम्यवादी जगत में जो काम कार्ल मार्क्स ने किया। वही भारत में लार्ड मैकाले ने किया। भारत में सबसे बड़ी क्रांति को लॉर्ड मैकाले ने जन्म दिया जिसके कर्ज से यहाँ के बहुजन कभी भी मुक्त नहीं हो सकते। लॉर्ड मैकाले के शिक्षा व कानून सुधारों से फकीर, पंडित, शूद्र सब समान माने जाने लगे। यह सच्चाई है कि मैकाले ने आगे आने वाली पीढ़ी का मार्ग प्रशस्त किया जिसके कारण ज्योतिबा फुले, शाहूजी महाराज, रामासामी नायकर और डॉ.अंबेडकर जैसी महान विभूतियों का उदय हुआ। जिन्होंने भारत का नया अध्याय लिखा।
पढ़ना-पढाना उस समय बहुजन या शूद्र वर्ण के लिए निषिद्ध था व समान न्याय के रास्ते बंद थे। अंग्रेजी शिक्षा और आईपीसी लागू कर लॉर्ड मैकाले ने उस जंजीर को काट दिया है जो बहुजनों को सदियों से जकड़े थी। लॉर्ड मैकाले ने शिक्षक भर्ती की नई व्यवस्था की जिसमें हर जाति धर्म का व्यक्ति शिक्षक बनने का अधिकारी था। हम गलतफहमीवस मैकॉले के प्रति अगर अनादर का भाव रखते हैं तो यह ठीक नहीं। हमारे अन्य बहुजन नायकों की तरह वह भी हमारे उद्धारक हैं। वर्णवादी समाज की नजरों में मैकाले भले ही आदरणीय नहीं हो परंतु बहुजनों के लिए तो वे मसीहा थे। हम उन्हें कोटिश: नमन करते हैं।



