सिर्फ प्रतिरोध और आंदोलनों से चीजें नहीं बदलती : अनामिका

मज़कूर आलम दिल्ली। जनवादी लेखक संघ, दिल्ली ने 25 नवम्बर से 10 दिसम्बर तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे ‘लैंगिक-आधारित हिंसा के विरुद्ध 16 दिवसीय सक्रियता अभियान के मौके पर को हरकिशन सिंह सुरजीत भवन, दिल्ली में ‘लैंगिक हिंसा : पहचान, प्रतिरोध, कानून’ विषय पर एक-दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया। कार्यक्रम की शुरुआत हाल ही […]

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गबन- उपन्यास मुंशी प्रेमचंद

बरसात के दिन हैं, सावन का महीना। आकाश में सुनहरी घटाएँ छाई हुई हैं। रह – रहकर रिमझिम वर्षा होने लगती है। अभी तीसरा पहर है; पर ऐसा मालूम हों रहा है, शाम हो गयी। आमों के बाग़ में झूला पड़ा हुआ है। लड़कियाँ भी झूल रहीं हैं और उनकी माताएँ भी। दो-चार झूल रहीं […]

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पुरस्कार : हिन्दी कहानी जयशंकर प्रसाद

आर्द्रा नक्षत्र आकाश में काले काले बादलों की घूमड़, जिसमें देव-दुंदुभी का गंभीर घोष । प्राची के एक निरभ्र कोने से स्वर्ण पुरुष झांकने लगा था। देखने लगा महाराज की सवारी ।शैलमाला के अंचल में समतल उर्वरा भूमि से सोंधी बास उठ रही थी । नगर-तोरण से जयघोष हुआ, भीड़ में गजराज का चामधारी शुण्ड […]

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नमक का दरोगा : मुंशी प्रेमचंद

जब नमक का नया विभाग बना और ईश्वर-प्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया तो लोग चोरी-छिपे इसका व्यापार करने लगे। अनेक प्रकार के छल-प्रपंचों का सूत्रपात हुआ, कोई घूस से काम निकालता था, कोई चालाकी से। अधिकारियों के पौ-बारह थे। पटवारीगिरी का सर्वसम्मानित पद छोड़-छोड़कर लोग इस विभाग की बर्क़-अंदाज़ी करते थे। […]

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बूढ़ी काकी : मुंशी प्रेमचंद

जिह्वा-स्वाद के सिवा और कोई चेष्टा शेष न थी और न अपने कष्टों की ओर आकर्षित करने का, रोने के अतिरिक्त कोई दूसरा सहारा ही। समस्त इन्द्रियाँ, नेत्र, हाथ और पैर जवाब दे चुके थे। पृथ्वी पर पड़ी रहतीं और घर वाले कोई बात उनकी इच्छा के प्रतिकूल करते, भोजन का समय टल जाता या […]

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पूस की रात : मुंशी प्रेमचंद

हल्कू एक क्षण अनिश्चित दशा में खड़ा रहा। पूस सिर पर आ गया, कम्मल के बिना हार में रात को वह किसी तरह नहीं जा सकता। मगर सहना मानेगा नहीं, घुड़कियाँ जमावेगा, गालियाँ देगा। बला से जाड़ों में मरेंगे, बला तो सिर से टल जाएगी। यह सोचता हुआ वह अपना भारी-भरकम डील लिए हुए (जो […]

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दो बैलों की कथा : मुंशी प्रेमचंद

झूरी काछी के दोनों बैलों के नाम थे हीरा और मोती। दोनों पछाईं जाति के थे—देखने में सुंदर, काम में चौकस, डील में ऊँचे। बहुत दिनों साथ रहते-रहते दोनों में भाईचारा हो गया था। दोनों आमने-सामने या आस-पास बैठे हुए एक-दूसरे से मूक-भाषा में विचार-विनिमय किया करते थे। एक, दूसरे के मन की बात को […]

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अतिथि : रवीद्रनाथ टैगोर की कहानी

काँठलिया के जमींदार मतिलाल बाबू नौका से सपरिवार अपने घर जा रहे थे। रास्ते में दोपहर के समय नदी के किनारे की एक मंडी के पास नौका बाँधकर भोजन बनाने का आयोजन कर ही रहे थे कि इसी बीच एक ब्राह्मण-बालक ने आकर पूछा, ‘‘बाबू, तुम लोग कहाँ जा रहे हो?’’ सवाल करने वाले की […]

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मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी – कफन

प्रेमचंद घीसू को उस वक़्त ठाकुर की बरात याद आई, जिसमें बीस साल पहले वह गया था। उस दावत में उसे जो तृप्ति मिली थी, वह उसके जीवन में एक याद रखने लायक़ बात थी, और आज भी उसकी याद ताज़ा थी, बोला—“वह भोज नहीं भूलता। तब से फिर उस तरह का खाना और भरपेट […]

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Premchand: The immortal legacy of a great litterateur

प्रेमचंद: एक महान साहित्यकार की अमर विरासत

साहित्य में यथार्थ और संवेदना का संगममुंशी प्रेमचंद (1880-1936) हिंदी और उर्दू साहित्य के ऐसे युग-प्रवर्तक साहित्यकार हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से भारतीय समाज के यथार्थ, उसकी कमियों, और मानवीय संवेदनाओं को इतनी गहराई से उकेरा कि उनकी रचनाएँ आज भी प्रासंगिक हैं। प्रेमचंद की लेखनी का वैशिष्ट्य उनकी सादगी, सामाजिक चेतना और […]

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